योगीराज डॉ॰ रामनाथ अघोरी: जीवन, साधना और चमत्कार

योगीराज डॉ॰ रामनाथ अघोरी: जीवन, साधना और चमत्कार

प्रारंभिक जीवन और सन्यास

योगीराज डॉ॰ रामनाथ अघोरी बाबा भारत के नाथ-अघोरी संप्रदाय के एक विख्यात, विरक्त तथा बहुचर्चित गुरु थे। इनका जन्म पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में तारापीठ के निकट पाहुर नामक राजपरिवार में हुआ था। किशोरावस्था से ही अध्यात्म की ओर उनका विशेष झुकाव था, जिसके परिणामस्वरूप इन्होंने मात्र सोलह वर्ष की उम्र में सन्यास ग्रहण कर लिया। तरुण रामनाथ ने सांसारिक ऐश्वर्य त्यागकर योग-पथ अपनाया और एक प्राचीन पीपल वृक्ष के नीचे गम्भीरनाथ बाबा से दीक्षा ली। इसी दीक्षा के साथ वे गोरखनाथ परंपरा की कानफटा शाखा में शामिल हुए। कानफटा योगी वे साधु होते हैं जो अपने कान छिदवाकर बड़े कुण्डल पहनते हैं और तांत्रिक साधनाओं व अलौकिक शक्तियों पर विशेष जोर देते हैं। रामनाथ बाबा ने एक सिद्ध योगी के रूप में लंबी आयु प्राप्त की – वे पूरे 117 वर्ष तक जीवित रहे।

नाथ संप्रदाय में उदय

संन्यास लेने के पश्चात रामनाथ बाबा ने गुरुओं की परंपरा का पूर्णतः पालन किया। वे आध्यात्मिक जीवन में दृढ़ निष्ठा के साथ आगे बढ़ते गए। धीरे-धीरे वे नाथ संप्रदाय में एक प्रमुख स्थान पर आसीन हो गए। लगभग एक शताब्दी तक योगीराज रामनाथ बाबा गोरखपुर स्थित नाथ अखाड़े के पीठाधीश्वर रहे। वे प्रतिवर्ष नेपाल के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर की यात्रा अवश्य करते थे, जहाँ शिवरात्रि महोत्सव के समय एक माह तक ठहरते थे। नेपाल में विभिन्न प्रकार के शैव साधु-संत और श्रद्धालु उनका बहुत सम्मान करते थे। काठमांडू में बागमती नदी किनारे श्मशान घाट पर स्थित नाथ सम्प्रदाय की प्रमुख धूनी पर उनकी गद्दी होती थी। युवा साधु के रूप में ही उनकी कठोर साधना, तप और अदम्य साहस ने पूरे नाथ समुदाय को प्रभावित कर दिया था। शीघ्र ही रामनाथ बाबा नाथ-पंथ के कानफटा योगियों के “सितारा शिष्य” माने जाने लगे। उनकी गिनती नाथ संप्रदाय के उन विरले साधकों में होने लगी जो परंपरा के जीवंत धारक और योग के उच्च कोटि के अनुभवी थे।

तीर्थयात्राएँ और कठोर साधना का सफर

दीक्षा प्राप्ति के बाद योगीराज रामनाथ बाबा ने दशकों तक कठोर तपोयात्रा की। उन्होंने प्रायः पचास वर्ष तक नंगे पैर देश-विदेश में तीर्थाटन और भ्रमण किया। इस दौरान उनके पास ना के बराबर सांसारिक संपत्ति थी – बस योग साधना और इष्ट नाम का सहारा था। रामनाथ बाबा ने हिमालय के प्रमुख पर्वत शिखरों और शक्तिपीठों का दौरा किया तथा वहाँ गहन साधना में लीन रहे। कहा जाता है कि वे भारत की सीमाएँ पार कर तिब्बत और चीन तक पैदल पहुँच गए थे। अपनी यात्रा के क्रम में वे सुदूर साइबेरिया के व्लादिवोस्तोक शहर तक पहुँचे, फिर अरबी देशों में गए और अंततः चीन, मध्य एशिया, फारस तथा इराक होते हुए भारत लौटे। इस व्यापक भ्रमण के दौरान भी वे निरंतर मंत्रयोग और आध्यात्मिक साधनाएँ करते रहे।

भारत लौटने के बाद उन्होंने सबसे पहले आधुनिक पाकिस्तान के मकरान तट क्षेत्र में स्थित विख्यात शक्तिपीठ हिंगलाज माता के धाम में साधना की। नाथ परंपरा में इस शक्ति स्थल को अत्यंत पवित्र माना जाता है, अतः रामनाथ बाबा ने वहाँ तपस्या कर सिद्धियां अर्जित कीं। इसके पश्चात गुजरात के गिरनार पर्वत पर पहुंचकर उनकी योग-यात्रा एक महत्वपूर्ण शिखर पर पहुँची। गिरनार में दीर्घकालीन तपस्या के फलस्वरूप उन्हें अंतरंग अनुभूति हुई कि अब वे योग-जगत में एक विशेष स्थान पर आरूढ़ हो गए हैं। यहीं से उन्हें “योगीराज” अर्थात “योगियों के राजकुमार” की पदवी मिली।

गिरनार में सिद्धि प्राप्ति के बाद योगीराज रामनाथ बाबा ने भारत के विभिन्न पंथों का ज्ञान अर्जित करने की दिशा में कदम बढ़ाया। कहते हैं कि बाद में वे पौराणिक नगरी द्वारका भी गए, जिससे यह संकेत मिलता है कि उन्होंने विभिन्न धार्मिक परंपराओं के तीर्थस्थलों का भ्रमण कर वहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा को आत्मसात् किया। समस्त जटिल साधनाएँ संपन्न करने के उपरांत रामनाथ बाबा आसाम की पवित्र कामाख्या पीठ चले गए। कामाख्या के भूतनाथ श्मशान में उन्होंने एक लंबा समय बिताया और उग्र तांत्रिक साधनाएँ संपन्न कीं। श्मशान में साधना करते हुए वे श्मशान-वासी भैरव तथा देवी महाकाली के विविध रूपों का साक्षात्कार करने लगे।

कालांतर में रामनाथ बाबा वापस काठमांडू लौट आए और पशुपतिनाथ मंदिर स्थित श्मशान भूमि को अपना स्थायी साधना-क्षेत्र बना लिया। यहाँ गहन तप एवं स्वाध्याय द्वारा उन्होंने मंत्र ज्ञान तथा वेद ज्ञान में अद्वितीय सिद्धि प्राप्त की। कई गुप्त तांत्रिक विद्याएँ, जो आधुनिक युग में लगभग लुप्तप्राय थीं, उन्होंने आत्मसात कर लीं। इस उच्च कोटि के ज्ञान तथा तांत्रिक सिद्धि के शिखर पर पहुंचकर रामनाथ बाबा ने अघोर मार्ग अपना लिया और अनेक साधकों को योग व तंत्र की गूढ़ साधनाओं की दीक्षा देने लगे। इसी चरण पर वे “अघोरेश्वर” नाम से विख्यात हुए – जिसका अर्थ है “अघोर स्वरूप वाले ईश्वरतुल्य गुरु”।

अघोरी परंपरा तंत्र का चरम रूप मानी जाती है, जिसमें सभी सामजिक व धार्मिक वर्जनाओं को तोड़कर अद्वैत ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास होता है। अघोरपंथ के प्रर्वतक स्वयं त्रिदेवस्वरूप भगवान दत्तात्रेय माने जाते हैं। जीवन-मृत्यु, शुद्ध-अशुद्ध जैसे द्वैत भाव अघोरियों के लिए माया हैं, जिन्हें चुनौती देकर वे मोक्ष मार्ग का अनुसरण करते हैं। संस्कृत शब्द “अघोर” का अर्थ ही है – अ + घोर अर्थात “जो घोर नहीं है”, यानी प्रकाशमय और सब भेदभावों से परे पूर्ण सजग जीवनशैली। योगीराज रामनाथ बाबा ने अपने जीवन द्वारा इस अघोर सिद्धांत को साकार किया – श्मशान की साधनाएँ, सामाजिक नियमों की परवाह किए बिना चरम तंत्र प्रयोग, और मृत्यु तथा भय पर विजय प्राप्त कर दिव्य चेतना का अवतरण।

प्राचीन गुप्त ज्ञान की खोज

1970 के दशक के उत्तरार्ध में श्री मृत्युंजय डे नामक एक शिष्य ने रामनाथ बाबा की सेवा करने का सौभाग्य पाया। उन्होंने अपने गुरु द्वारा प्रदर्शित कई अद्भुत चमत्कारों को स्वयं देखा। गुरुजी की सिद्धियों की चर्चा सुनकर नेपाल के शाही पुस्तकालय के अधिकारी भी प्रभावित हुए और उन्होंने योगीराज रामनाथ बाबा को वहाँ के नवीन पुस्तकालय में प्रवेश की विशेष अनुमति दी। रामनाथ बाबा ने उस पुस्तकालय में प्राचीन ताड़पत्र पांडुलिपियाँ देखीं जो गोरक्षनाथ के समय से भी पूर्व की नाथ परंपरा के इतिहास पर प्रकाश डालती थीं। इन प्राचीन दस्तावेजों में कुछ ऐसी गुप्त शिक्षाएँ थीं जो उस समय प्रचलित नाथ-संप्रदाय की शिक्षाओं से बिल्कुल भिन्न थीं। उन्होंने इन पांडुलिपियों का गहन अध्ययन किया और पाया कि समय के साथ नाथ संप्रदाय की मूल शिक्षाओं में विकृति आ गई थी। दरअसल, ये खोजें तत्कालीन नाथ संप्रदाय के कुछ स्थापित मान्यताओं को चुनौती दे रही थीं, जिससे रामनाथ बाबा के मन में जिज्ञासा और भी प्रबल हो उठी।

प्राचीन ज्ञान का सत्यापन करने के उद्देश्य से योगीराज रामनाथ बाबा तिब्बत के सुप्रसिद्ध साम्ये मठ की ओर रवाना हो गए। साम्ये तिब्बत का प्रथम बौद्ध विहार था, जिसकी स्थापना 8वीं शताब्दी में महान गुरु पद्मसम्भव ने की थी। आशा थी कि वहाँ संरक्षित पुरातन ग्रंथों में नाथ संप्रदाय के उन पहलुओं का उल्लेख मिलेगा जो भारत में लुप्त हो गए थे। लेकिन दुर्भाग्यवश, कानफटा दर्शनी गोरखनाथी साधु होने के कारण साम्ये मठ में उन्हें प्रवेश देने से इनकार कर दिया गया। तिब्बती बौद्ध भिक्षुओं को आशंका थी कि एक नाथ योगी की उपस्थिति उनके मठ की परंपरा के अनुकूल नहीं होगी। इस अस्वीकार से दुखी होकर रामनाथ बाबा तिब्बत से नेपाल की ओर वापस लौट पड़े।

वापसी यात्रा के दौरान बर्फीली हिमालय की ढलानों पर उन्हें एक दिव्य योगी से भेंट का सौभाग्य मिला। यह योगी स्वयं को तिब्बोतीनाथ बाबा कहते थे, जिन्हें तिब्बत में छख्तांग रिनपोछे नाम से जाना जाता था। तिब्बोतीनाथ बाबा ने रामनाथ बाबा की जिज्ञासा और तृष्णा को पहचाना और उन्हें पश्चिम बंगाल के बकरेश्वर नामक स्थान पर चलने का आग्रह किया। बकरेश्वर एक प्राचीन तीर्थ है जहाँ गर्म जल के प्राकृतिक स्रोत और एक शिव मंदिर है, और यह तांत्रिक साधनाओं के लिए भी जाना जाता है। यहीं बकरेश्वर में रामनाथ बाबा की मुलाक़ात एक रहस्यमय महायोगी ब्योम शंकर अघोरी बाबा से हुई।

ब्योम शंकर अघोरी बाबा के संबंध में अनेक दंतकथाएँ प्रचलित थीं। कहा जाता है कि वे गुरु पद्मसम्भव की तांत्रिक परंपरा के अंतिम सीधे उत्तराधिकारी थे। उनकी आयु दो सौ वर्ष से भी अधिक बताई जाती थी, वे सात फुट लंबे, गोरे-चिट्टे और नीली आँखों वाले अद्भुत व्यक्तित्व थे। इतने दिव्य स्वरूप वाले योगी को पाकर रामनाथ बाबा ने उन्हें गुरु मानकर दुर्लभ शिक्षाएँ ग्रहण करनी प्रारंभ कीं। ब्योम शंकर अघोरी ने योगीराज रामनाथ बाबा को प्राचीन वज्रयान नाथ-अघोरी साधनाएँ सिखाईं, जो नाथ संप्रदाय और बौद्ध वज्रयान परंपरा के संगम से जन्मी गुप्त तकनीकें थीं। गुरु और शिष्य लंबे समय तक अघोर साधनाओं एवं तांत्रिक क्रियाओं में रत रहे। जब इन समस्त गूढ़ विद्याओं में पारंगत हो गए, तब गुरु ब्योमशंकर ने संकेत दिया कि अब पुनः तिब्बत जाकर साम्ये मठ में प्रवेश करने का समय आ गया है।

इस बार योगीराज रामनाथ बाबा के साथ स्वयं तिब्बोतीनाथ बाबा थे और ब्योमशंकर अघोरी का आशीर्वाद भी। तदनुसार, वे साम्ये मठ लौटे जहाँ इस बार उनका खुले दिल से स्वागत किया गया। उन्होंने वहाँ लम्बे समय तक अध्ययन और अध्यापन किया। बहुत-से प्राचीन नाथ-संप्रदाय के ग्रंथ और प्रवचन साम्ये मठ के संग्रह में थे, जिन्हें भारत के महान बौद्ध आचार्य अतीश दीपंकर 11वीं शताब्दी में नालंदा विश्वविद्यालय से तिब्बत ले गए थे। (विदित हो कि 1193 ईस्वी में नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को आक्रमणकारियों ने जला दिया था, जिससे वज्रयान परंपरा भारत से लगभग समाप्त हो गई और केवल कुछ नाथ व बौद्ध परंपराओं में ही जीवित रही।) साम्ये में उपलब्ध उन पाण्डुलिपियों के अध्ययन से रामनाथ बाबा को नाथ परंपरा की सच्ची प्राचीन शिक्षाओं का ज्ञान हुआ, जो समय के साथ गुमराह करने वाले विकृत विचारों से ढँक गई थीं। उन्होंने पाया कि गोरखनाथी संप्रदाय की कई वर्तमान मान्यताएँ मूल नाथ सिद्धांतों से भटकी हुई थीं और उनमें कुछ गलत प्रचार भी शामिल हो गया था।

समग्र प्राचीन ज्ञान को आत्मसात कर लेने के बाद योगीराज रामनाथ बाबा वापस नेपाल लौट आए, इस निश्चय के साथ कि अब वे नाथ संप्रदाय में फैली भ्रांतियों का निवारण करेंगे। वे विशाल ज्ञान-भंडार के साथ नेपाल पहुँचे और राजगुरु के सम्मानित पद पर सुशोभित हुए। उन्होंने नेपाल में अपने शिष्यों और अनुयायियों को नाथ परंपरा के वे पुराने मूलग्रंथ, उपदेश और प्रक्रियाएँ दिखाईं जो वे साथ लेकर आए थे। जल्द ही योगीराज रामनाथ बाबा ने चमत्कारों और आलौकिक घटनाओं की झड़ी लगा दी ताकि नाथ संप्रदाय में व्याप्त झूठे आदेशों और दिखावटी परंपराओं को उखाड़ फेंका जा सके। उनके प्रयासों से प्राचीन शुद्ध परंपरा का पुनरुद्धार हुआ और गोरखनाथी संप्रदाय में जो कपटपूर्ण रीति-रिवाज घुस आए थे, वे निर्मूल हो गए।

नेपाल के तत्कालीन नरेश राजा बीरेन्द्र भी योगीराज रामनाथ बाबा के शिष्य बने। गुरु-शिष्य के इस संबंध में कई दिव्य घटनाएं घटीं। एक बार रामनाथ बाबा ने राजा बीरेन्द्र को अपनी खुली हथेली पर स्वयं भगवान शिव और महाकाली के दर्शन करवाए – यह उनके द्वारा प्रदत्त एक विलक्षण चमत्कारिक दृष्टि थी। राजा सहित दरबार के लोग अचंभित रह गए कि साधारण दिखने वाली बाबा की हथेली में साक्षात शिव-काली प्रकट हो सकते हैं। योगीराज रामनाथ बाबा नेपाल में जनकल्याण हेतु कई आध्यात्मिक एवं सामाजिक सुधारों में भी जुट गए। उन्होंने वहाँ के धार्मिक जीवन में अनेक परिवर्तनों का सूत्रपात किया, जिससे नेपाल के आम जन को लाभ पहुँचा।

उल्लेखनीय है कि नेपाल के प्रथम विश्वविद्यालय – त्रिभुवन विश्वविद्यालय – की स्थापना में भी योगीराज रामनाथ बाबा का अप्रत्यक्ष किंतु महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है। 1950 के दशक में जब नेपाल में विश्वविद्यालय खोलने की परिकल्पना शुरू हुई, तब बाबा ने अपने आध्यात्मिक प्रभाव से इस प्रयास को सफल बनाने में सहायता दी। विक्रम संवत 2013 (सन् 1956) में त्रिभुवन विश्वविद्यालय की स्थापना के समय डॉ॰ रामनाथ अघोरी बाबा की भूमिका को आज भी श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है। राजा त्रिभुवन और उनके पुत्र राजा महेंद्र, दोनों नियमित रूप से काठमांडू के भस्मेश्वर घाट स्थित रामनाथ बाबा के आश्रम में दर्शन हेतु आया करते थे। इससे स्पष्ट है कि बाबा न सिर्फ आध्यात्मिक जगत में बल्कि शिक्षाओं एवं राष्ट्रनिर्माण के कार्यों में भी परोक्ष रूप से जुड़े थे।

हालांकि आगे चलकर शिष्य-गुरु के इस मधुर संबंध में कटुता आ गई। राजा बीरेन्द्र ने कुछ ऐसी चेष्टाएँ कीं जो गुरुजी की दृष्टि में आध्यात्मिक मर्यादा के प्रतिकूल थीं। विशेषकर, राजा बीरेन्द्र तांत्रिक सिद्धियों के अनुचित प्रयोग और सत्ता हेतु उनका उपयोग करने की प्रवृत्ति दिखाने लगे, जिससे रामनाथ बाबा क्षुब्ध हो उठे। इतना ही नहीं, राजा ने अपने गुरु के प्रति आदर में भी कमी दिखाई जो कि नाथ परंपरा में अक्षम्य मानी जाती है (गुरु को पिता से बढ़कर माना जाता है)। इन सब घटनाओं से आहत होकर योगीराज रामनाथ बाबा ने नेपाल त्यागने का निर्णय लिया। वे काठमांडू छोड़कर कलकत्ता (कोलकाता) चले गए। नेपाल छोड़ते समय उन्होंने राजा को चेतावनी भरे शब्दों में एक भविष्यवाणी सुनाई: “कर्मचक्र ऐसा चल पड़ा है कि राजा बीरेन्द्र का मस्तक एक दिन उनके ही पुत्र के हाथों कटेगा, भले ही वे इससे बचना चाहें”। सन 2001 में क्राउन प्रिंस दीपेंद्र द्वारा पूरे नेपाली राजपरिवार की नृशंस हत्या ने गुरुजी की भविष्यवाणी को अक्षरशः सत्य सिद्ध कर दिया – यह घटना राजा बीरेन्द्र के कर्मों का दुष्परिणाम मानी गई।

शिक्षाएँ और विचारधारा

योगीराज रामनाथ अघोरी बाबा अपने समय के अनेक साधु-संतों से बिल्कुल भिन्न दृष्टिकोण रखते थे। 1978 के आसपास पशुपतिनाथ में उनसे एक पाश्चात्य साधक जॉर्ज की मुलाकात हुई, जिन्हें बाबा ने स्नेहपूर्वक “साधु जॉर्ज” कहकर पुकारा। साधु जॉर्ज के अनुसार रामनाथ बाबा आधुनिक युग के योगियों और संन्यासियों को ज़्यादा पसंद नहीं करते थे। बाबा कहते थे कि आजकल के कई साधु आलसी और कमजोर हो गए हैं; वे वैराग्य के कठिन मार्ग से विचलित होकर नाम-यश पाने में, भौतिक सुविधाओं में और नशे की आदतों में खो गए हैं। उनका मत था कि विद्युत, यातायात जैसी आधुनिक सुविधाओं ने भी तपस्वियों को सरल मार्ग का आदी बना दिया है।

रामनाथ बाबा ने साधु जॉर्ज को सलाह दी कि पश्चिमी होकर केवल सन्यास धारण कर लेना ही सार्थक नहीं है। उन्होंने विशेष रूप से जोर देकर कहा कि गृहस्थ रहते हुए तांत्रिक तरीके से अंतर्निहित कुण्डलिनी शक्ति जगाना ज्यादा उचित है। उनका मानना था कि एक सामान्य गृहस्थ भी प्राणायाम, ध्यान और तंत्र साधना का मिलाजुला मार्ग अपनाकर ऊँचे आध्यात्मिक स्तर तक पहुँच सकता है। दरअसल, बाबा स्वयं वैरागी होते हुए भी उन लोगों को प्रोत्साहित करते थे जो सांसारिक जीवन में रहकर साधना करना चाहते थे, क्योंकि गृहस्थ-योगी का मार्ग उन्हें अधिक व्यवहार्य लगता था।

एक शांत दोपहर, जब आसपास कोई अन्य शिष्य उपस्थित नहीं था, रामनाथ बाबा ने साधु जॉर्ज को पशुपतिनाथ की दिव्यता का प्रत्यक्ष अनुभव कराने का निश्चय किया। उन्होंने जॉर्ज को बागमती नदी के उस पार मंदिर के एक प्रांगण में बेल वृक्ष के नीचे विशेष विधि से ध्यान करने को कहा। बाबा ने उस वृक्ष को शिव से सम्बद्ध बताया और जॉर्ज को आसन जमाकर अपने निर्देशानुसार ध्यानारूढ़ किया। इसके बाद, गुरु रामनाथ बाबा ने अपनी सिद्ध शक्ति और कृपा का संचार दूर बैठे ही जॉर्ज में कर दिया। साधु जॉर्ज के अनुसार, कुछ ही क्षणों में वे गहन ध्यान की आनंदपूर्ण अवस्था में पहुँच गए जहाँ कई घंटे बीत गए। उन्हें अपने स्थूल शरीर और चित्त की सीमाओं से परे असीम शांति और ज्ञान का अनुभव हुआ। इस प्रकार बाबा ने मात्र मानसिक संप्रेषण और आध्यात्मिक अनुकंपा से एक विदेशी शिष्य को अद्भुत प्रज्ञा प्रदान की। इस घटना ने जॉर्ज को दिखा दिया कि योगीराज रामनाथ बाबा अपने शिष्यों की चेतना को उच्च अवस्था तक उठाने की क्षमता रखते थे।

रामनाथ बाबा की सामाजिक दृष्टि भी अपने समय से काफी आगे थी। वे जाति-पांति, छुआछूत और धर्म के नाम पर भेदभाव के घोर विरोधी थे। उनके लिए मानव मात्र समान था। पशुपतिनाथ में बैठकर वे देखा करते थे कि कई सच्चे भक्त सिर्फ नीची जाति या विदेशी होने के कारण मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग के दर्शन नहीं कर पाते थे – इसे वे हृदय से गलत मानते थे। वे प्रायः कहते थे कि “जाति प्रथा तो समाज में असमानता बनाए रखने का बहाना भर है”। बाह्य आडम्बर और कठोर कर्मकांडों को भी वे आध्यात्मिक उन्नति में बाधक मानते थे। उन्होंने परिहासपूर्वक ब्राह्मणिकल कर्मकांडों को “बच्चों का खेल” कहा जो केवल वक्तव्य एवं दिखावे में समय नष्ट करते हैं। बाबा के मतानुसार अगर भक्त रोज घंटों पूजा-विधि में लगाने के बजाय थोडा-थोडा समय भी सच्ची अंतर्ध्यान में लगाएं, तो आध्यात्मिक जगत में कई नए सिद्ध पुरुष उभर सकते हैं। वे प्रतिपल अभ्यास के महत्व पर जोर देते थे: “थोड़ा-थोड़ा किया गया सही प्रयास भी एक दिन फल के पहाड़ जैसा विशाल बन जाता है”।

चमत्कार एवं सिद्धियाँ

योगीराज रामनाथ अघोरी बाबा एक ऐसे पूर्ण सिद्ध योगी थे जिनका मन दिव्य क्वांटम क्षेत्र में स्थिर था – अर्थात वे अपनी इच्छानुसार लोक-परलोक की शक्तियों का संचरण कर सकते थे। उनकी अनेक सिद्धियों और चमत्कारों की चर्चा शिष्यमंडली में प्रचलित थी। वे दूरस्थ भावना एवं विचारों को पढ़ लेने की क्षमता रखते थे। कई अन्य गुरु अपने शिष्यों का मंत्रोच्चारण ठीक करवाने हेतु रामनाथ बाबा के पास भेजते थे। रामनाथ बाबा बिना मंत्र सुने, शिष्य के मन में उठ रही कंपन से ही जान लेते कि वह कहां ग़लत उच्चारण कर रहा है। तत्पश्चात वे उसे सही ध्वनि या अक्षर का निर्देश देते, जिससे जप शुद्ध हो जाता। इस प्रकार वे दूर से ही मन की तरंगों को ग्रहण कर उनका संशोधन कर सकते थे।

बाबा को आयुर्वेद एवं जड़ी-बूटियों का अत्यंत व्यापक ज्ञान था। वे एक कुशल चिकित्सक की तरह रोगियों का उपचार करते थे और दवाओं-प्रयोगों द्वारा असाध्य व्याधियाँ तक ठीक कर देते थे। अपने इसी गुण के कारण शिष्यों द्वारा उन्हें सम्मान से “डॉक्टर” की उपाधि दी गई थी। वास्तव में, बाबा ने डॉक्टर की पदवी किसी आधुनिक विश्वविद्यालय से नहीं, बल्कि पारंपरिक आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में अर्जित की थी – उन्होंने वनस्पतियों, औषधियों और प्राकृतिक उपचार पद्धतियों में सिद्धहस्त होकर अनेकों पीड़ितों की मदद की।

उनके प्रमुख शिष्यों में से एक, योगीराज डॉ॰ त्यागीनाथ अघोरी, ने अपने गुरु के अनुशासन और प्रेमपूर्ण कठोरता के बारे में उल्लेख किया है। त्यागीनाथ बाबा बताते हैं कि “गुरुजी डॉ॰ रामनाथ बाबा अत्यंत सख्त और अनुशासित शिक्षक थे। उन्हें ऐसे चेले बिल्कुल पसंद नहीं थे जो आध्यात्मिकता के नाम पर प्रसिद्धि या कृपा पाना चाहें। उन्होंने तो मुझसे प्रेम करने के साथ-साथ कई बार इतनी मार भी दी कि मेरी जान पर बन आई, और ये सब उन्होंने मेरे कल्याण के लिए किया। वे अपने शिष्य में पूर्णता देखना चाहते थे, इसलिए कोई भी कोताही बर्दाश्त नहीं थी। उनके पावन सान्निध्य में रहना अपने आप में आशीर्वाद था, जिसका एकमात्र प्रतिदान यही हो सकता है कि हम उन्हीं की तरह कठोर अनुशासन और भक्ति से मोक्ष और करुणा के पथ पर अग्रसर हों।” त्यागीनाथ बाबा यह भी मानते हैं कि गुरु रामनाथ बाबा ने उन्हें जैसे तराश कर एक समर्थ योगी बनाया। उदाहरणस्वरूप, गुरुजी के आदेश से त्यागीनाथ को रोज़ तड़के 3:30 बजे उठकर पशुपतिनाथ घाट के परिसर में मौजूद हर साधु-संन्यासी को सुबह 4 बजे तक गरम चाय बाँटनी होती थी। इसमें किसी भी तरह की देरी या बहाना स्वीकार नहीं था। त्यागीनाथ बताते हैं कि “मैं आधे घंटे तक दौड़-दौड़कर सबको चाय पिलाता था और समय से ठीक 4 बजे गुरुजी के सामने उपस्थित हो जाता था”। इस कठोर दिनचर्या का उद्देश्य शिष्य में सेवा, त्वरिता और समर्पण विकसित करना था। इस प्रकार की तपस्या से ही गुरु मंत्र की सच्ची सिद्धि संभव है – यह संदेश वे अपने अनुयायियों को देते थे।

रामनाथ बाबा के असंख्य चमत्कारों में एक प्रसंग ऐसा है जो काशी (वाराणसी) के साधु समाज में आज भी किंवदंती बनकर सुनाया जाता है। इस घटना को सुनाकर उनके समकालीन नागा साधु बाबा रामपुरी ने अपनी पुस्तक में विस्तार से वर्णन किया है। हुआ यूँ कि एक बार वाराणसी में गंगा तट पर स्थित दशाश्वमेध घाट पर बाबा रामनाथ अघोरी ने एक महाभोज (भण्डारा) आयोजित करने की घोषणा कर दी। स्थानीय लोग और बनिये इस बात पर हँसे कि जिसके पास अपनी धूनी पर चंद छोटे-छोटे बर्तन हैं, वह सैकड़ों साधुओं को कैसे भोजन कराएगा। लेकिन बाबा अपनी बात पर अडिग रहे और नियत दिन सैकड़ों बाबा-फकीर पंगत में भोजन करने आ पहुँचे। रामनाथ बाबा ने चंद छोटी हांडियों में सब्जी, दाल, पूरी, हलवा इत्यादि बनाना शुरू किया। आश्चर्य की बात – उन दो छोटे बर्तनों से लगातार भोजन निकलता रहा और सारे लोगों को भरपेट खिला दिया गया। बाद में पता चला कि उन बर्तनों का तो तला ही नहीं था – अर्थात् वे अदृश्य पारलौकिक भंडार से जुड़े थे! भोजन के साथ-साथ बाबा ने प्रत्येक साधु को एक-एक रुपया दक्षिणा भी दिया। सब लोग अचंभित थे कि यह अलौकिक दिव्य भोजन कहाँ से अवतरित हो रहा है।

भोजन की यह महाप्रसादी समाप्त होने पर बाबा ने घोषणा की कि अभी उनका कार्य पूरा नहीं हुआ है। उन्होंने तुरंत फिर सौ पत्तलों की पंगत बिछवाई और इस बार बिना दक्षिणा के भोजन परोसा गया। इतने में श्रद्धालुओं और दर्शकों की भीड़ उनके चरण स्पर्श करने उमड़ पड़ी। अचानक बाबा ज़ोर-ज़ोर से कुत्ते की तरह भौंकने लगे। यह दृश्य देखकर भीड़ घबराकर पीछे हट गई। उसी क्षण चारों दिशाओं से कुत्तों की पूरी फ़ौज दौड़ती हुई घाट पर आ गई और उन जूठी पत्तलों का सारा प्रसाद चट कर गई। लोगों को तब एहसास हुआ कि बाबा ने यह दौरा कुत्तों के दावत के लिए ही डाला था। किंतु चमत्कार अभी शेष था – बाबा ने तीसरी बार फिर सौ पत्तलें बिछवाईं, इस बार पहले की तरह प्रति थाली एक-एक रुपया भी रखा गया। बाबा रामनाथ अघोरी गंभीर स्वर में बोले, “महिला और सज्जनो! यह दौर मेरे दोस्तों, अर्थात प्रेत-पिशाचों के लिए है!” जैसे ही ये शब्द निकले, पलों में प्लेट परोसा सारा भोजन और पैसे आँखों से ओझल हो गए। वहां उपस्थित जनसमूह स्तब्ध रह गया – यह प्रत्यक्ष प्रमाण था कि बाबा अदृश्य आत्माओं और भूत-प्रेतों को भी वश में कर उन्हें तृप्त करने की सिद्धि रखते थे। इस घटना के बाद से लोग श्रद्धावनत होकर रामनाथ अघोरी बाबा को महाशक्ति के रूप में नमन करने लगे।

उपरोक्त कथा यह संकेत देती है कि योगीराज रामनाथ बाबा के पास कुछ अदृश्य सहायक थे जो उनके आदेश पर कार्य करते थे। ऐसा कहा जाता है कि बाबा के आसपास सूक्ष्म लोक के कई शक्तियां हमेशा रहती थीं, जिन्हें वे आवश्यकता अनुसार प्रकट या अप्रकट कर देते थे। सामान्य जन की मदद करने या आध्यात्मिक संदेश देने हेतु वे प्रायः इन सिद्धियों का उपयोग किया करते थे। परंतु एक महत्वपूर्ण बात यह थी कि बाबा ने कभी भी अपनी सिद्धियों का प्रयोग स्वार्थपूर्ति या दिखावे के लिए नहीं किया। वे प्रायः कहते थे कि अनेक लोग सिद्धियाँ केवल अपने अहंकार या व्यक्तिगत मोक्ष के लिए भले करते हों, पर योगीराज रामनाथ बाबा ने जो भी सिद्धियाँ प्राप्त कीं, वे मानवता के आध्यात्मिक उत्थान के लिए कीं। उन्होंने कितने ही बंधनों में जकड़े प्राणियों को दीक्षा देकर मुक्ति दिलाई और उन्हें सच्चे ज्ञान की राह दिखाई। उनकी दृष्टि में चमत्कारों का महत्त्व केवल तब है जब वे भक्तों का कल्याण करें या धर्म की स्थापना में सहायक हों, अन्यथा नहीं।

अंतिम दिवस और विरासत

योगीराज डॉ॰ रामनाथ अघोरी बाबा ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष कलकत्ता में व्यतीत किए (हालांकि उनके हृदय का लगाव नेपाल से हमेशा बना रहा)। 6 जनवरी 1982 को 117 वर्ष की आयु में उन्होंने योग के माध्यम से शांतिपूर्वक अपना भौतिक शरीर त्याग दिया। उनका महासमाधि दिवस साधकों द्वारा तीरोधान दिवस के रूप में मनाया जाता है। पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में बालूरघाट नामक स्थान पर उनकी समाधि स्थापित की गई है। बताया जाता है कि जिस क्षण उन्होंने प्राणों का त्याग किया, वातावरण अत्यंत दिव्य हो उठा। उनके शिष्य साधक वासुदेव बाबा उस समय वहाँ उपस्थित थे। वे बताते हैं, “ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं महाभैरव/भगवान शिव नंदी आदि गणों के साथ कैलाश पर्वत को वापस प्रस्थान कर रहे हों और उनके स्वागत में दिव्य नगाड़े-डमरू बज रहे हों”। वास्तव में, उनके पार्थिव शरीर के विसर्जन को भी अघोर रीति से संपन्न किया गया। परंपरा के अनुसार, योगीराज रामनाथ बाबा ने जलती चिता की बजाय भूमि में समाधि लेना पसंद किया (कहा जाता है कि उन्होंने नेपाल में समाधि देने की इच्छा जताई थी, पर परिस्थितिवश उनका पार्थिव शरीर बंगाल में ही समाधिस्त किया गया)।

योगीराज रामनाथ बाबा अपनी अनगिनत शिक्षाओं, सिद्धियों और सेवाओं के माध्यम से पीछे एक समृद्ध आध्यात्मिक विरासत छोड़ गए हैं। उनके निधन के बाद उनके शिष्य योगीराज डॉ॰ त्यागीनाथ अघोरी बाबा ने काठमांडू, नेपाल में बाबा की गद्दी संभाली और अपने गुरु के कार्य को आगे बढ़ाया। त्यागीनाथ बाबा ने सदी से अधिक आयु तक मानव सेवा और साधना जारी रखी – वे पशुपतिनाथ के भस्मेश्वर घाट पर स्थित नाथ सिद्ध मंदिर में रहते थे और जनकल्याण एवं साधक-दीक्षा के कार्य करते रहे। (सन 2020 के दशक में त्यागीनाथ बाबा ने भी समाधि ले ली, पर उनकी स्मृति में वहाँ एक समाधि-स्मारक बाद में बनाया गया।) रामनाथ बाबा के अन्य प्रमुख शिष्यों में चुंचुन बाबा और पगला बाबा के नाम उल्लेखनीय हैं। चुंचुन बाबा श्रीलंका से आए एक गृहस्थ-त्यागी थे जो बाद में काठमांडू में ही अघोरी तप में लीन रहे। वे पशुपति क्षेत्र में दयालु एवं करुणामय संत के रूप में प्रसिद्ध थे – गायों को पालना, कुत्तों को भोजन देना और अपने शरीर पर रहने वाले कीट-पतंगों तक को कष्ट न देना उनके स्वभाव में था। पगला बाबा उत्तरप्रदेश से आए एक अवधूत थे जिनकी योग-सिद्धियाँ विलक्षण थीं। बाह्य रूप से वे सदा मदमस्त रहते और लोगों को लगता कि वे नशे में हैं, किंतु वे उन्नत योग अवस्था में डूबे रहते थे। उनके विषय में एक कथा प्रचलित थी कि वे जिस खप्पर में मदिरा पान करते थे, कभी-कभी उसे अपने होंठों से हटाकर सामने रखते और खप्पर खुद-ब-खुद सिगरेट के कश लेता दिखता था। हालांकि पगला बाबा इन चमत्कारों का सार्वजनिक प्रदर्शन बहुत कम करते थे।

आज योगीराज डॉ॰ रामनाथ अघोरी बाबा का नाम नाथ-अघोर परंपरा के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे उन विरले साधकों में थे जिन्होंने पूरी दुनिया घूमकर, हर प्रकार की साधना को आत्मसात कर, अंततः सब मत-मतांतरों का सार मानवजाति की सेवा में लगाया। शिव के उपासक नाथ योगियों से लेकर बौद्ध वज्रयान तंत्र, सूफ़ी दरवेशों की रहस्यविद्या से लेकर शक्ति की अघोर साधना तक – ऐसा कोई आयाम नहीं जिसे रामनाथ बाबा ने छुआ न हो। उनके जीवन से हमें यही संदेश मिलता है कि सत्य की तलाश में निरंतर अभ्यास, निश्छल भक्ति और नि:स्वार्थ सेवा अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने दिखाया कि चमत्कार और सिद्धियाँ तभी मूल्यवान हैं जब वे अहंकाररहित होकर लोकमंगल हेतु प्रयुक्त हों। एक ओर वे श्मशान की राख में लिपटे भयावने अघोरी थे तो दूसरी ओर रोगियों के लिए संवेदनशील वैद्य “डॉक्टर बाबा” थे; एक ओर अपने शिष्यों के लिए कठोर अनुशासक गुरु थे तो दूसरी ओर भोलेभाले भक्तों के लिए दयालु मार्गदर्शक; एक तरफ तंत्र-मंत्र के गूढ़ रहस्य खोले तो दूसरी तरफ सामान्य गृहस्थ को भी योग का रास्ता दिखाया। इस प्रकार योगीराज रामनाथ अघोरी बाबा वास्तविक अर्थों में “योगिराज” थे – योगियों के भी गुरु, तांत्रिकों के भी तंत्री, तथा अघोरियों में सर्वोच्च अघोरेश्वर।

उनका जीवनचरित एक जीवंत किंवदंती है, जो सिद्ध करता है कि मानव शरीर में अनंत संभावनाएँ निहित हैं। योग, तप और ज्ञान के द्वारा साधारण मानव महायोगी बन सकता है। योगीराज रामनाथ बाबा ने अपने 117 वर्षों के जीवन में जो साधनात्मक ऊँचाइयाँ छुईं और जिन अलौकिक अनुभवों को चरितार्थ किया, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। आज भी उनके कथा-प्रसंग भारत, नेपाल तथा विश्व के अनेक आध्यात्मिक मंचों पर सुनाए जाते हैं – और हर बार सुनने वाला परमात्मा की उस महान लीला पर आश्चर्यचकित रह जाता है जो उन्होंने योगीराज रामनाथ अघोरी बाबा के रूप में रची थी।

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