Skip to product information
1 of 16

Siddh Santo Ki Khoj

Pranav Gita By Jnanendranath Mukhopadhyay (Set of 2 Parts in 1 Book)

Pranav Gita By Jnanendranath Mukhopadhyay (Set of 2 Parts in 1 Book)

Regular price Rs. 1,370.00
Regular price Sale price Rs. 1,370.00
Sale Sold out
Shipping calculated at checkout.
Quantity

श्रीमद्भगवद्गीता की एक प्रामाणिक एवं अद्वितीय योगशास्त्रीय व्याख्या (क्रमानुसार साधना मार्ग)

Pranav Gita (प्रणव गीता) केवल एक साधारण टीका नहीं है, बल्कि यह क्रियायोग साधना का एक व्यावहारिक और जीवंत मार्गदर्शिका ग्रंथ है. काशीधाम स्थित प्रणवाश्रम के अधीश्वर, महान योगी-प्रवर परमहंस श्रीमत् स्वामी प्रणवानन्द गिरि महाराज के दिव्य अंतर्मुखी उपदेशों और उनके आध्यात्मिक अनुभवों (अनुभवाभाष) पर आधारित इस ग्रंथ का संपादन उनके परम क्रियायोगी शिष्य श्री ज्ञानेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय (B.A., B.L.) द्वारा किया गया है.

इस विशेष संस्करण में गीता के सभी अध्यायों (भाग 1 और भाग 2) को एक ही व्यापक पुस्तक में समाहित किया गया है. इसमें मूल संस्कृत श्लोकों के साथ-साथ अत्यंत सरल, सुबोध और अंतर्मुखी हिंदी अनुवाद दिया गया है, जो साधक को सीधे आत्म-साक्षात्कार की ओर प्रेरित करता है.


Key Features & Insights from the Text (पुस्तक की मुख्य विशेषताएं)

  • साधना का क्रमिक विकास (Step-by-Step Sadhana): इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें गीता के एक-एक अध्याय को साधना का ही एक-एक क्रम (Sadhana Stages) माना गया है. जैसे-जैसे साधक आगे बढ़ता है, उसका अनुभव गहरा होता जाता है.

  • अनुभवाभाष भाषा (Experiential Commentary): स्वामी प्रणवानन्द गिरि जी महाराज ने ध्यान-निमीलित नेत्रों से जो प्रत्यक्ष किया, सुना और अनुभव किया, उसी गूढ़ रहस्य को इस पुस्तक में पिरोया गया है. यह कोरी किताबी व्याख्या नहीं, बल्कि अनुभूत सत्य है.

  • विभूतियों से विश्वरूप दर्शन: पुस्तक के द्वितीय भाग में स्पष्ट किया गया है कि कैसे 10वें अध्याय (सर्व विभूति ज्ञान) को समझने के बाद मन के उदार होने से 11वें अध्याय में 'विश्वरूप दर्शन' संभव होता है, और फिर 12वें अध्याय में आत्मा का अनन्तरूप दिखाई देता है.

  • क्रियायोग और अष्टांग योग का समन्वय: प्राण-अपान की समता, चित्त की अवस्थाओं का निरोध, और मेरुदण्ड के भीतर षट्चक्र वेधन की सूक्ष्म आध्यात्मिक मीमांसा इस ग्रंथ में बहुत ही स्पष्ट रूप से की गई है.

  • साधकों के लिए अमूल्य निधि: कूटस्थ चैतन्य की प्राप्ति और अंतराकाश के दिव्य नाद को समझने के लिए यह ग्रंथ हर गंभीर साधक के पास होना ही चाहिए.


 Specifications

  • Title: प्रणव गीता (Pranav Gita - Set of 2 Parts in 1 Book)

  • Author/Commentator: श्रीमत् स्वामी प्रणवानन्द गिरि परमहंस (मूल उपदेश)

  • Editor & Publisher: श्री ज्ञानेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय (Jnanendra Nath Mukhopadhyay Property Trust, Kolkata)

  • Language: Sanskrit Text with Hindi Translation (अनुभवाभाष भाषा)

  • Edition: 2024 (Authentic Lineage Publication)

  • Binding: Paperback / Softcover

  • Total Pages: 779 Pages (Comprehensive Edition)

  • Dimensions: 21.5 cm x 14 cm (8.50 x 5.50 Inches)

  • Weight: 660 Grams


Who Should Read This Book? (यह पुस्तक किसके लिए है?)

  1. क्रियायोगी और ध्यान साधक: जो प्राणायाम, कुंडलिनी, और आंतरिक चक्रों की साधना की गहरी समझ चाहते हैं.

  2. भगवद्गीता के शोधार्थी: जो शाब्दिक अर्थ से परे जाकर गीता के वास्तविक व्यावहारिक और योगपरक अर्थ को खोजना चाहते हैं.

  3. सनातन धर्म के जिज्ञासु: जो प्रामाणिक गुरु-शिष्य परंपरा (Lineage Text) से जुड़े ग्रंथों का अध्ययन करना पसंद करते हैं.

View full details